ऑडियंस मूवी रिव्यू : पिंक !

तापसी पन्नू ने की बॉलीवुड में धमाकेदार वापसी !

शुजीत सरकार को उनकी अलग तरह की फिल्मों के लिए जाना जाता है जैसे यहाँ, विक्की डोनर और मद्रास कैफ़े । इस बार उन्होंने एक नए ढर्रे की फिल्म दर्शकों के सामने लाने की कोशिश की और पिंक के साथ वो काफी हद तक इसमें सफल हुए हैं। इस बार शुजीत ने ये फिल्म प्रोड्यूस की है और अनिरुद्ध रॉय चौधरी ने इसे डायरेक्ट किया है। कहानी है तीन आम नौकरीपेशा लड़कियों की, जिनको एक रात एक लड़के पर हमला करने की वजह से एक गहरे कानूनी दलदल में फँसना पड़ता है।  किस तरह एक पावरफुल इंसान सिस्टम के साथ मिलकर उसे दबाने की कोशिश करता है और कैसे वो तीनों लडकियां इस जद्दोजहद से बाहर निकलती हैं, यही इस फिल्म की कहानी है।  

ऑडियंस मूवी रिव्यू : पिंक !

लेकिन बात सिर्फ कहानी की नहीं है। बात इसकी है कि ये कहानी आगे कैसे बढ़ती है।  अमिताभ बच्चन एक वकील के किरदार में हैं और उन्होंने इसे बखूबी निभाया है। किसी भी केस के तकनीकी पहलुओं पर गौर करके उसे तर्क के आधार पर सही या गलत साबित करने पर काफी ध्यान दिया गया है जो आम तौर पर फिल्मों में कम ही होता है। 

ऑडियंस मूवी रिव्यू : पिंक !

बॉलीवुड में कोर्ट रूम ड्रामा फिल्म्स ज़्यादा नहीं बनतीं। और जिन फिल्मों में थोड़े बहुत सीन्स होते हैं उनको भी केवल फिल्म में मसाला बढ़ाने के लिए रखा जाता है।  काफी समय बाद कोई ऐसी फिल्म आयी है जिसमें पूरी कहानी एक कोर्ट रूम में खुलती है और लोगों को अंत में पता चलता है कि हुआ क्या।  अनिरुद्ध रॉय चौधरी ने फिल्म के दूसरे हाफ में कुछ बेहद अच्छे सीन्स डायरेक्ट किये हैं जिनमें तापसी पन्नू का किरदार और अमिताभ बच्चन का किरदार, दोनों बहुत खूबसूरती से उभर के आते हैं। गाने ध्यान बँटाते हुए लग सकते हैं, लेकिन बैकग्राउंड स्कोर अच्छा है।   

ऑडियंस मूवी रिव्यू : पिंक !

फिल्म में तापसी पन्नू का किरदार (मीनल अरोड़ा ) मुख्य भूमिका में लगता है , लेकिन कीर्ति कुलहरि (फलक अली ) और एंड्रिया तारियांग (एंड्रिया ) का किरदार भी बेहद प्रभावी है।

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अमिताभ बच्चन एक कलाकार के तौर पर इस फिल्म के बाद और निखर गए हैं और उन्हीं के साथ पीयूष मिश्रा ने काफी मज़बूती से फिल्म की कमान संभाली है।  

शुरुआत में फिल्म थोड़ा कंफ्यूज करती है लेकिन इंटरेस्ट बनाये रखती है। जैसे जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, कई परतें खुलती जाती हैं।  एक लेवल के बाद दर्शक किरदारों के साथ रिलेट करने लग जाते हैं।  फिल्म के कुछ हिस्से कमज़ोर पड़ते हैं, कहीं कहीं अमिताभ बच्चन के डायलॉग्स काफी उपदेश जैसे भी लगते हैं लेकिन एक बार किरदारों के साथ ऑडियंस का जुड़ जाना एक सफल फिल्म की निशानी है जिसमें डायरेक्टर और एक्टर खरे उतरते हैं।  यह फिल्म देखी जानी चाहिए।  4 स्टार्स !