फ़ोर्स 2 फिल्म ऑडियंस रिव्यू : विलेन की कहानी भी हीरो जैसी होती है

!कितने ही रॉ एजेंट देश की सेवा में अपनी जान दे देते हैं, लेकिन आर्मी और पुलिस के जवान की तरह उन्हें शहीद होने का सम्मान नहीं मिलता है बल्कि कई बार सरकार उनकी मृत्यु के बाद उन्हें अपना नागरिक मानने से भी इंकार कर देती है। ऐसे ही रॉ एजेंटों के जीवन को समर्पित अभिनय देव की बहुचर्चित फ़िल्म फ़ोर्स 2 देखने के बाद एक टिपिकल हॉलीवुड एक्शन फ़िल्म देखने का अहसास होता है, जिसमें कार चेजिंग, ऊँची इमारतों के ऊपर हीरो और विलेन जो चूहा-बिल्ली की तरह एक दूसरे का पीछा कर रहे हैं।

फ़ोर्स 2 फिल्म ऑडियंस रिव्यू : विलेन की कहानी भी हीरो जैसी होती है

चीन में रॉ के तीन एजेंट्स की हत्या हो जाती है। उन्हें कौन मार रहा है इस बात की खबर रॉ को भी नहीं लग पा रही है, लेकिन मुंबई पुलिस के एसीपी यशवर्धन (जॉन अब्राहम) को एक किताब मिलती है, जिसमें इस केस से जुड़ा कुछ सुराग छुपा होता है। मरने वाले तीन एजेंटों में से एक यशवर्धन के बचपन का दोस्त होता है। केबिनेट सेक्रेटरी के हस्क्षेप के बाद रॉ एजेंट केके (सोनाक्षी सिन्हा) और एसीपी यशवर्धन एजेंटों के हत्या के कारणों और दोषियों की तलाश में निकलते हैं। जल्द ही उन्हें पता चल जाता है कि कोई अपना दूतावास का स्टाफ देश से साथ गद्दारी कर रहा है, लेकिन कोई क्यों अपने ही देश से गद्दारी क्यों करेगा यही फ़ोर्स 2 आगे की कहानी है।

फ़ोर्स 2 फिल्म ऑडियंस रिव्यू : विलेन की कहानी भी हीरो जैसी होती है

जहाँ तक फ़िल्म में अभिनय की बात है, तो जॉन अब्राहम और ताहिर राज भसीन ने अच्छा अभिनय किया है, लेकिन उनके अभिनय में नयापन और मौलिकता नहीं है। जॉन का हर सीन में शर्ट उतारना भी लोगों को शायद अखरे। रॉ एजेंट की भूमिका के साथ सोनाक्षी सिन्हा न्याय नहीं कर पाई है। वे पूरी फ़िल्म में “नहीं यश नहीं” का डायलॉग ही बोलती नजर आयीं। डायरेक्टर ने उनके रोल पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया है। ये आप इसी बात से समझ सकते हैं कि वो 'रॉ एजेंट' हैं लेकिन उन्हें गोली चलाने से भी डर लगता है। फ़िल्म में इन तीनों के अलावा अन्य किसी कलाकार के पास कुछ करने के लिए नहीं था।

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बात अगर फ़िल्म के डायरेक्शन की करें तो कहानी इंटरवल से पहले बहुत तेजी से आगे बढती है जिस वजह से बहुत सारी चीज़ें आप को अटपटी लगेगी, लेकिन इंटरवल के बाद फ़िल्म कहानी के साथ न्याय करने में सफल होती है।अभिनय देव जॉन और सोनाक्षी की जोड़ी को पर्दे पर ठीक से पेश नहीं कर पाये, लगता है डायरेक्टर अभिनय देव ने सोनाक्षी के रोल को गंभीरता से नहीं लिया।

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फ़िल्म की सिनेमेटोग्राफी अच्छी है। बुडापेस्ट की लोकेशंस को अच्छे से फिल्माया गया है तो वहीं एक्शन सीन्स में कुछ नये प्रयोग भी किए गए हैं जिसका अहसास देखने के बाद हो जायेगा। फ़िल्म में संगीत के रूप में ‘काटे नहीं कटते’ गाना ही देखने और सुनने लायक है। आपने अगर हॉलीवुड की बहुत ज़्यादा एक्शन फ़िल्में नहीं देखीं है, तो ये फ़िल्म आप को जरुर पसंद आएगी।फ़िल्म क्यों देखें? रॉ एजेंट के जीवन से रूबरू होने तथा जॉन और ताहिर की चूहे- बिल्ली की दौड़ देखने के लिए।

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